नानकदेवजी की कथा
एक बार गुरु नानक जी की संगत में सत्संग में एक बच्चा अपनी मां के साथ सतसंग सुनने आता है। तो गुरु नानकदेव जी बच्चे से पूछते हैं कि बेटा आप इस छोटी सी उम्र में सत्संग में क्यों आते हो आपकी तो अभी खेलने खाने की उम्र है अभी भक्ति की क्या जरूरत है ? तो बच्चे ने एक उदाहरण दिया,कि गुरु जी मेरी मां ने मुझे एक बार चूल्हे में लकड़ी जलाने के लिए कहा तो मैंने मोटी लकड़ी चूल्हे में आग जलाने के लिए लगा दी। आग जलाने की कोशिश की तो वह जली नहीं ।बड़ी मोटी व बड़ी लकड़ी थी।मैं बहुत देर प्रयास करता रहा प्रयास करता रहा लेकिन नहीं जली। फिर मेरी माँ ने कहा बेटा जला दी आग, मैंने बोला नहीं जली मां।तो माँ ने कहा कैसे जला रहे हो।।मैंने कहा मोटी सी लकड़ी लगाई है।।और आग जला रहा हूँ, लेकिन जल नहीं रही है।तब माँ ने कहा कि बेटा, पहले छोटी छोटी लकड़ी लगाओ।तब तब आग जलेगी।।मैने मां के बताए अनुसार किया तो तुरंत लकड़ियों में आग जलने लगी। तब उस आग से मेरी समझ में आया कि मौत तो कभी भी आ सकती है।वो ये नहीं देखती कि कौन छोटा है या कौन बड़ा है।जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है कब मोत आ जाये।उसी दिन से में रोजाना सतसंग में आता हूँ, और...