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Showing posts from June, 2020

नानकदेवजी की कथा

एक बार गुरु नानक जी की संगत में सत्संग में एक बच्चा अपनी मां के साथ सतसंग सुनने आता है। तो गुरु नानकदेव जी बच्चे से पूछते हैं कि बेटा आप इस छोटी सी उम्र में सत्संग में क्यों आते हो आपकी तो अभी खेलने खाने की उम्र है अभी भक्ति की क्या जरूरत है ? तो बच्चे ने एक उदाहरण दिया,कि गुरु जी मेरी मां ने मुझे एक बार चूल्हे में लकड़ी जलाने के लिए कहा तो मैंने मोटी लकड़ी  चूल्हे में आग जलाने के लिए लगा दी। आग जलाने की कोशिश की तो वह जली नहीं ।बड़ी मोटी व बड़ी लकड़ी थी।मैं बहुत देर प्रयास करता रहा प्रयास करता रहा लेकिन नहीं जली। फिर मेरी माँ ने कहा बेटा जला दी आग, मैंने बोला नहीं जली मां।तो माँ ने कहा कैसे जला रहे हो।।मैंने कहा मोटी सी लकड़ी लगाई है।।और आग जला रहा हूँ, लेकिन जल नहीं रही है।तब माँ ने कहा कि बेटा, पहले छोटी छोटी लकड़ी लगाओ।तब तब आग जलेगी।।मैने मां के बताए अनुसार किया तो तुरंत लकड़ियों में आग जलने लगी। तब उस आग से मेरी समझ में आया कि मौत तो कभी भी आ सकती है।वो ये नहीं देखती कि कौन छोटा है या कौन बड़ा है।जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है कब मोत आ जाये।उसी दिन से में रोजाना सतसंग में आता हूँ, और...

मांस खाने का आदेश परमेश्वर का नही है

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मांस खाना परमेश्वर का आदेश नहीं ! पवित्र बाईबल (उत्पत्ति ग्रन्थ 1:29) प्रभु ने मनुष्यों के खाने के लिए जितने बीज वाले छोटे पेड़ तथा जितने पेड़ों में बीज वाले फल होते हैं वे भोजन के लिए प्रदान किए हैं, माँस खाना नहीं कहा है।

तत्त्व ज्ञान

गीता अध्याय 13 श्लोक 11 में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि अध्यात्म ज्ञान में रूचि रखकर तत्व ज्ञान के लिए सद्ग्रन्थों को देखना तत्वज्ञान है, वह ज्ञान है तथा तत्वज्ञान की अपेक्षा कथा कहानियाँ सुनाना, सुनना, शास्त्राविधि विरूद्ध भक्ति करना यह सब अज्ञान है। तत्वज्ञान के लिए परमात्मा को जानना ही ज्ञान है। गीता अध्याय 13 श्लोक 12 में गीता ज्ञान दाता ने अपने से “परम ब्रह्म” का ज्ञान कराया है, जो परमात्मा (ज्ञेयम्) जानने योग्य है, जिसको जानकर (अमृतम् अश्नुते) अमरत्व प्राप्त होता है अर्थात् पूर्ण मोक्ष का अमृत जैसा आनन्द भोगने को मिलता है। उसको भली-भाँति कहूँगा। (तत्) वह दूसरा (ब्रह्म) परमात्मा न तो सत् कहा जाता है अर्थात् गीता ज्ञान दाता ने अध्याय 4 श्लोक 32, 34 में कहा है कि जो तत्वज्ञान है, उसमें परमात्मा का पूर्ण ज्ञान है, वह तत्वज्ञान परमात्मा अपने मुख कमल से स्वयं उच्चारण करके बोलता है। उस तत्वज्ञान को तत्वदर्शी सन्त जानते हैं, उनको दण्डवत् प्रणाम करने से, नम्रतापूर्वक प्रश्न करने से वे परमात्म तत्व को भली-भाँति जानने वाले तत्वदर्शी सन्त तुझे तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। इससे सिद्ध हुआ कि गी...