कर्म कितने प्रकार के होते है
*🌴🌴तत्वज्ञान🌴🌴*
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*प्रश्न :- कर्म कितने प्रकार के हैं ?*
उत्तर :- कर्म दो प्रकार के हैं। एक शुभ कर्म, दूसरा अशुभ यानि एक पुण्य और दूसरा पाप कर्म कहा जाता है।
*1. पुण्य कर्म :-* शास्त्र विधि अनुसार भक्ति कर्म, दान, परमार्थ, भूखों को भोजन देना,असहाय की हर संभव सहायता, दया भाव रखना, अपने से दुर्बल से भी मित्र जैसा व्यवहार करना। परनारी को माता तथा बहन के भाव से देखना, सत्य बोलना, अहिंसा में विश्वास रखना,साधु-संतों, भक्तों की सेवा व सम्मान करना, माता-पिता तथा वृद्धों की सेवा करना आदि-आदि शुभ
यानि पुण्य कर्म हैं।
*2. पाप कर्म :-* शास्त्र विधि को त्यागकर मनमाना आचरण करके भक्ति कर्म करना, चोरी , परस्त्री से बलात्कार, परस्त्री को दोष दृष्टि से देखना, माँस-मदिरा, नशीली वस्तुओं का सेवन, रिश्वत लेना, डाके मारना, हिंसा करना आदि-आदि अशुभ कर्म हैं यानि पाप कर्म हैं।
*प्रश्न :- कर्म बंधन कैसे बनता है ?*
उत्तर :- काल ब्रह्म ने जीव के कर्मों को तीन प्रकार से बाँटा है।
*1.संचित कर्म*
*2. प्रारब्ध कर्म*
*3. क्रियावान कर्म।*
*1. संचित कर्म :-* संचित कर्म वे पाप तथा पुण्य कर्म हैं जो जीव ने जन्म-जन्मातरों में किए थे। उनका भोग प्राप्त नहीं हुआ है। वे जमा हैं।
*2.प्रारब्ध कर्म :-* प्रारब्ध कर्म वे कर्म हैं जो जीव को जीवन काल में भोगने होते हैं जो संचित कर्मों से औसत करके बनाए जाते हैं। उदाहरण के लिए यदि पाप कर्म एक हजार (1000) हैं और पुण्य कर्म पाँच सौ (500) हैं तो दोनों से औसत में लिए जाते हैं। प्रारब्ध कर्म यानि जीव का भाग संचित कर्मों से Average में लेकर बनाया जाता है। यदि 20-20 प्रतिशत लेकर प्रारब्ध बना तो पाप कर्म 50 और पुण्य कर्म 25 बने। इस प्रकार प्रारब्ध कर्म यानि जीव का भाग्य बनता है। इनको प्रारब्ध कर्म कहते हैं।
*3. क्रियावान कर्म :-* अपने जीवन काल में जो कर्म प्राणी करता है, वे क्रियावान कर्म कहे जाते हैं। ये 75% तो प्रारब्ध कर्म होते हैं यानि जो संस्कार यानि भाग्य में लिखे हैं, वे किए जाते हैं, 25% कर्म करने में जीव स्वतंत्र है। 75% कर्म करने में जीव बाध्य है क्योंकि वे प्रारब्ध में लिखे होते हैं, परतंत्र हैं। *परंतु पूर्ण संत मिलने पर परिस्थिति बदल जाती है।*
*प्रश्न :- कहते हैं कि जीव कर्म करने में स्वतंत्र है।*
उत्तर :- जीव 25% कर्म तो स्वतंत्र रूप से करता है। अपने जीवन काल में 75% कर्म तो प्रारब्ध वाले करने में परतंत्र है, विवश है। केवल 25% कर्म करने में स्वतंत्र है। पंरतु पूर्ण संत मिलने के पश्चात् परिस्थिति बदल जाती है। प्रारब्ध में सुसंगत तथा कुसंगत भी लिखी होती है।
उदाहरण :- जैसे राजा दशरथ जी ने यज्ञ किया था। सुयोग्य पुत्र प्राप्ति के लिए यह क्रियावान स्वतंत्र कर्म था अन्य संतान तीन पुत्र (भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न) तथा पुत्रि सांता थे,जो कि प्रारब्ध से मिले थे। श्री रामचन्द्र जी का सीता से विवाह प्रारब्ध था, 14 वर्ष का बनवास सीता, राम, लक्ष्मण का प्रारब्ध था। जंगल में बनवास के समय पशु शिकार करके मारे, वह स्वतंत्र कर्म था। सूपनखां का नाक काटना लक्ष्मण का स्वतंत्र कर्म था। सीता का अपहरण प्रारब्ध कर्म सीता तथा रावण दोनों का था। यह कारण अन्य भी हो सकता था जो शुर्पणखा बनी थी । तेतीस करोड़ देवताओं का कैद में रहना प्रारब्ध कर्म था। सुग्रीव के भाई बाली को राम ने मारा, यह स्वतंत्र कर्म था।फिर वह संचित कर्मों में जमा होकर प्रारब्ध बना और श्री कृष्ण रूप में श्री रामचन्द्र जी वाली आत्मा को भोगना पड़ा। जो शिकारी था, जिसने श्री कृष्ण के पैर में विषाक्त तीर मारकर हत्या की, वह शिकारी बाली वाली आत्मा थी। रावण की मृत्यु और तेतीस करोड़ देवताओं को रावण की कैद से मुक्ति मिलना ये प्रारब्ध था।
श्री कृष्ण जी ने जो आठ विवाह किए, वह प्रारब्ध था। राधा से प्रेम भी प्रारब्ध था। गोपियों के साथ भोग-विलास यह प्रारब्ध कर्म था यानि परतंत्र होकर किया कर्म था, परंतु 16 हजार स्त्रियों को एक राजा की कैद से छुड़वाकर अपने पास रखकर उनसे भोग-विलास करना यह स्वतंत्र कर्म था। कुब्जा को स्वस्थ करना प्रारब्ध कर्म था। उसके साथ भोग-विलास करना स्वतंत्र कर्म था। कंस को मारना प्रारब्ध कर्म था। केशी, चाणूर, पुतना का वध स्वतंत्र कर्म था क्योंकि वे कंस के द्वारा प्रलोभन या दबाव से भेजे गए थे। इस प्रकार कर्मों का लेखा जानें, कम लिखे को अधिक समझें।
*कबीर सागर का सरलार्थ*
*पेज 345-346*
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