शिव लिंग पूजा

इस शिवलिंग की पूजा अंध श्रद्धावान करते हैं जो शर्म की बात तो है ही,
परंतु धर्म के विरूद्ध भी है क्योंकि यह गीता व वेद शास्त्रों में नहीं लिखी है।
इसका खण्डन सूक्ष्मवेद में इस प्रकार किया है कि :-
वाणी :- धरै शिव लिंगा बहु विधि रंगा, गाल बजावैं गहले।
जे लिंग पूजें शिव साहिब मिले, तो पूजो क्यों ना खैले।।
शब्दार्थ :- परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन मूर्ति पूजक
अपनी साधना को श्रेष्ठ बताने के लिए गहले यानि ढ़ीठ व्यक्ति गाल बजाते हैं यानि
व्यर्थ की बातें बड़बड़ करते हैं जिनका कोई शास्त्रा आधार नहीं होता। वे जनता को
भ्रमित करने के लिए विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पत्थर के शिवलिंग रखकर अपनी
रोजी-रोटी चलाते हैं।
कबीर जी ने कहा है कि मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यदि शिव जी के
लिंग को पूजने से शिव जी भगवान का लाभ लेना चाहते हो तो आप धोखे में हैं।
यदि ऐसी बेशर्म साधना करनी है तो खागड़ (व्गत्रडंसम ब्वू) के लिंग की पूजा
कर लो जिससे गाय को गर्भ होता है। उससे अमृत दूध मिलता है। हल जोतने के
लिए बैल व दूध पीने के लिए गाय उत्पन्न होती है जो प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देता
है। आपको पता है कि खागड़ के लिंग से कितना लाभ मिलता है। फिर भी उसकी
पूजा नहीं कर सकते क्योंकि यह बेशर्मी का कार्य है।
इससे स्पष्ट है कि आप अंध श्रद्धावानों को यही नहीं पता है कि यह पत्थर
का बना शिवलिंग व जिसमें यह प्रविष्ट दिखाया है, यह क्या है? यदि आपको पता
होता तो इसको एक आँख भी नहीं देखते, पूजा तो बहुत दूर की कौड़ी 

‘‘शास्त्रा विरूद्ध साधना की प्रेरणा भी काल ब्रह्म करता है’’
जैसे लिंग (शिवलिंग) की पूजा काल ब्रह्म ने प्रारम्भ करवाई। इसी प्रकार
शास्त्राविधि से भी भ्रमित यही करता है। प्रमाण :- श्री विष्णु पुराण तृतीय अंश
अध्याय 17 श्लोक 1.44 तथा अध्याय 18 श्लोक 1.36 में।
काल जाल का अन्य प्रमाण :- श्री विष्णु पुराण के तृ
ृतीय अंश के अध्याय 17
श्लोक 1 से 44 तथा अध्याय 18 श्लोक 1 से 36 में पृ
ृष्ठ 125 से 221 पर लिखा है कि
देवता तथा दैत्य दोनों ही वैदिक धर्म अनुसार साधना करते थे। एक समय दोनों का
सौ दिव्य वर्ष तक युद्ध हुआ। देवता पराजित हो गए। देवताओं ने क्षीर समुद्र के
उत्तरीय तट पर जाकर तपस्या की और भगवान विष्णु की आराधना के लिए इस स्तव
का गान किया। देवगण बोले- हम लोग लोक नाथ भगवान विष्णु की आराधना के लिए
जिस वाणी का उच्चारण करते हैं, उससे वे आद्य-पुरूष श्री विष्णु भगवान प्रसन्न
हों।(अध्याय 17/मन्त्रा 11) उस ब्रह्मस्वरूप को जो निराकार है। उस ब्रह्मस्वरूप को
नमस्कार है। हे पुरूषोतम्! आप का जो क्रूरता ओर माया से युक्त घोर तमोमय रूप हैं,
उस राक्षस स्वरूप को नमस्कार है।(20) जो कल्पान्त में समस्त भूतों अर्थात प्राणियों
का भक्षण कर जाता है, आपके उस काल स्वरूप को नमस्कार है।(25) जो प्रलय काल
में देवता आदि समस्त प्राणियों का भक्षण करके नृ
ृत्य करता है, आपके उस रूद्रस्वरूप
को नमस्कार है।(26) विष्णु पुराण तृतीय अंश अध्याय 17 के श्लोक 11 से 34 तक
स्त्रोत के समाप्त हो जाने पर देवताओं ने श्री हरि को हाथ में शंख चक्र, गदा लिए
गरूड़ पर आरूढ़ समुख विराजमान देखा।(35) देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान
विष्णु ने अपने शरीर से (वचन शक्ति से) एक मायामोह को उत्पन्न किया तथा कहा
कि वह माया मोह दैत्यों को वेद मार्ग की साधना से हटा कर मनमुखी साधना पर
आरूढ़ कर देगा। जिस कारण से दैत्य भक्तिहीन हो जाऐंगें तब, तुम देवता उन्हें मार
डालना। ऐसा ही हुआ, माया मोह ने सर्व दैत्यों (राक्षसों) को वैदिक मार्ग से विचलित
करके मनमुखी साधना पर आरूढ़ कर दिया। कुछ पश्चात् देवता तपस्या करके (बैट्री
चार्ज करके) दैत्यों के साथ युद्ध करने के लिए उपस्थित हुए। दैत्यों ने तपस्या करनी
त्याग दी थी जिससे उनमें सिद्धि शक्ति नहीं रही। (उनकी बैट्री चार्ज नहीं हुई) इस
कारण से देवताओं ने दैत्यों को मार डाला।
उपरोक्त विष्णु पुराण के उल्लेख का निष्कर्ष :-
काल ब्रह्म ने सर्व प्राणियों (देवताओं, ऋषियों, ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव तथा अन्य
प्राणियों) को भ्रमित किया हुआ है। यह स्वयं ही अपने तीनों पुत्रों (ब्रह्मा, विष्णु तथा
शिव) का रूप धारण कर लेता है। उपरोक्त स्तोत्रा में देवताओं ने श्री विष्णु की स्तुती
करनी चाही है, कर रहे हैं काल ब्रह्म की। वह काल ब्रह्म ही विष्णु रूप धारण करके
गरूड़ पर बैठ कर आश्वासन दे गया। अपने वचन से एक व्यक्ति उत्पन्न कर के माया
मोह नाम रख कर राक्षसों के पास भेज दिया। जो दैत्यगण तपस्या अर्थात् हठयोग
करते थे, उससे सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती थी। माया मोह ने वह साध्

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